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विश्व प्रसिद्ध लिंगो पेन कर्रसाड़ वल्लेकनार (सेमरगांव) आमाबेड़ा विकास खण्ड अंतागढ जिला कांकेर छत्तीसगढ।

लीलाधर साहू

गुण्डरदेही।

लिंगो कर्रसाड़ में जन समुदाय अपने अंदर प्ररेणा की खोज करते है, जीवन के विभिन्न संभावनाओ ऊर्जा और तरंगों को महसूस कर जीते है,इसकी जड़े लोगों को आध्यात्मिकता पर आधारित जीवन के प्राचीन एकात्म और समग्र दृष्टी सें जुड़ी है,इस लिंगो कर्रसाड़ मे उत्सव, संस्कृति, परंपरा, संस्कार, आस्था,समरसता,सहकारिता, कुटुम्ब भाव,प्रकृति आधारित जीवन, व्यक्ति के अंदर व्यक्तिगत रुप से शरीर ,मन,बुध्दि भावना,आध्यात्म से सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के साथ मूल में विविधताओ में भी सामूहिक मौलिक एकता का प्रतीक है।

जो सामुदायिक जीवन पर आधारित है ,यह कर्रसाड़ सामाजिक ताना-बाना ,साझी विरासत, सांस्कृतिक विरासत एवं धरोहर ,सांस्कृतिक पहचान, सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति से जुड़े आदर्श जीवन मूल्यों को अपनाने के साथ आज के युवा पीढ़ियो को और आने वाली पीढ़ी को अपने जड़ो को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करना भी कर्रसाड़ का मूल उद्देश्य है।लिंगो जातरा सहिष्णुता से आगें बढ़कर सत्यमार्ग तक पहुंचने के सभी मार्गो को स्वीकारते है और जीवन के एकात्म और समग्र दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है।लिंगो कर्रसाड़ सभ्यता के विकास और आधुनिक भौतिकवादी प्रगति के सोपानों से कोसों दूर बस्तरवासी सदियों से विकास की गठरी अपनें सिर पर लादे हुये,अभावों के बीच ,जीवन की अविरल धारा को निरंतर प्रवाहित किये हुये हैं।सघन साल वनों से आच्छादित,मनोरम दृश्यों से परिपूर्ण,कल -कल करते झरनें युक्त नदी-नालों तथा रंग बिरंगे सुंदर पक्षियों के कलरव के बीच स्थित है।

*महान संगीतज्ञ,पाटाड़ी,18 बाजांग 18पाटांग 18 डाकांग के आविष्कारक,महान गोटुल के संस्थापक ,नव खण्ड धरती, सोलह खण्ड पृथ्वी के संचालन कर्ता, सिंगारव्दीप के राजा रूपोलंग लिगों पेन का राऊड़*
,नार्र-वल्लेकनार्र(सेमरगांव),परगन -मर्रकावेडा(आमाबेड़ा),तहसील मर्रकावेडा,जिला -उत्तर बस्तर कांकेर,छत्तीसगढ़ में।
विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक उत्कृष्ठ सभ्यता,प्रकृति से जुड़े श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को माननें वालों की श्रेष्ठ गोंदोला ब्यवस्था में ,प्रत्येक कार्य पर्यावरण के अनुकुल,प्रचलित पेन बाना-बानी ब्यवस्था है ।इसके अंतर्गत वृहद रूप से पेनकड़ाओं एवं पेनमंडाओं की मानवीय जीवनशैली का जाल बिछा हुआ है,जो कि संपर्क के अभाव में आज तक अनसुलझा रहस्य बनकर रह गया है।इन्हीं पेनबानाओं एवं बानी ब्यवस्था कौशल में ,निहित कोयापुनेम में, जो कि पर्यावरण संतुलन एवं जीव जगत की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान व भविष्य की मानवीय ब्यवस्थाओं को निर्धारित करती है।वर्तमान दिनचर्या की।

आपाधापी,प्रतिस्पर्धा,राजनीतिक हथकंडे,भ्रष्टाचार, औद्योगिकीकरण के होड़ की वजह से,वातावरण प्रदुषित हो चुकी है।लोगों में धार्मिक असुरक्षा का भय है। जनजाति एवं बानी बिरादरी समुदाय में तर्कशीलता व विज्ञान सम्मत आधुनिक सोच का अभाव है,बानी बिरादरी समुदाय की अलिखित जीवनशैली रूढ़ी व प्रथा जो कि एक जांचा परखा सिस्टम है एवं लिखित भारत का संविधान का पालन व सुरक्षा कैसे हो? इन तमाम मुद्दों के मद्देनजर अनंत विकल्पों के साथ विचारों का समागम ,समस्त लाकंज भाईयों(तड़युह भाई) , अक्को-मामल एवं बारह बानी बिरादरी के सहयोग से लिंगो पेन के भव्य पेन कर्रसड़ होंने जा रहा है,जहां से संपूर्ण मानव समुदाय को विश्व शांति हेतु संदेश जाना अपेक्षित है।

बस्तर संभाग में पायी जानें वाले जनजातियों में,सर्वाधिक जनसंख्या गोंड समुदाय का है।गोंड समुदाय की अनेक उपजातियां शासन द्वारा निर्धारित हैं जैसे मुरिया,माड़िया,अबुझमाड़िया,डंडामी माड़िया,बायसनहार्न माड़िया,दोरला ,कोया-कुटमा आदि ,जैसे मुर से निवास करनें वालों को मुरिया, जीवन यापन के लिये माड़ क्षेत्र में निवास करनें वालों को माड़िया,अबुझमाड़ में रहनें वालों को अबुझमाड़िया,दक्षिण बस्तर में निवास करनें वाले गोंडो को कोया कुटमा कहा गया किंतु गोंड समुदाय में जाति नहीं बानी -बिरादरी ब्यवस्था होती है।

*प्रथम* बानी-बिरादरी समुदाय का प्रमुख आधार पेन-पुरखा होता है जो पेन कडा़-पेन मंडा से जुड़ा होता है ,जो समस्त बानी -बिरादरी समुदाय को अदृश्य रूप से जोड़े रखता है।
*दूसरा* आधार लिंगो पेन द्वारा स्थापित टोटम ब्यवस्था है।
*तीसरा* आधार जागा बुम और पेनकड़ा है,जहां पर विशेष अवसरों पर अपनें पुरखों को सेवा -अरजी की जाती है।इन विशेष अवसरों पर परिवार के प्रत्येक सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
महान लिंगो पेन सम्पूर्ण बानी-बिरादरी समुदाय का आराध्य पेन है।

प्रसिद्ध लिंगो पेन का कर्रसाड़ ललेंज(चांद) की स्थिति अनुसार पहले 12 वर्ष में एक बार होता था जिसे बुमकाल द्वारा लिंगो पेन से अनुमति लेकर संशोधित करनें का विचार किया गया,काफी विचार विमर्श के बाद 04 वर्ष निर्धारित किया गया क्योंकि लिंगो पेन का कर्रसाड़ चैत पुन्नी में ही होना है वह भी शुक्रवार के दिन और ऐसा संयोग 04 साल में ही हो पाता है।

बानी-बिरादरी गड़-गोंदोला समुदाय के गड़-कोट का सर्वोच्च बुम मुदिया-पाल याया-कारी याया द्वारा संस्कारीत ,कुंदा बुमयार्र के आसीद,रायताल मुदिया के राय,कंडा मुदिया एवं मुठ मुदिया के सहयोग,पटवेंज मुदिया के सलाह,उसेह मुदिया के संरक्षण में कोयापुनेम के शिल्पकार,गोटुल ब्यवस्था के संस्थापक,पाटा व डाका गूरू,पाड़ी-पारी व बिड़द नियामक,09कंड दरती16कंड पिरति के जानकार,गोंडवाना बुम में पेन -पुर्रूड़,पुकराल-स्पुराल आधारित बाना व बानी संस्थापक,पुरूड़ के ज्ञाता,सामुदायिक ब्यवस्था कौशल के अगुआ, तथा भाईयों में इसरो(छोटा),रूपोलंग लिंगो,जपमुदिया का प्रसिद्ध पेन कर्रसाड़

नार्र-वल्लेकनार्र(सेमरगांव),परगन-मर्रकावेडा(आमाबेड़ा),विकासखंड-अंतागड़,जिला-उत्तर बस्तर कांकेर,छत्तीसगड़,इंडिया में दिनांक 02,03,04 अपैल 2026 को आयोजित होना है।

प्रसिद्ध लिंगो पेन के 18 बाजा एवं आमंत्रित सगा पेन्क बानाओं के माध्यम से पेन कर्रसाड़ का विहंगम दृश्य देखनें एवं पुनेमी ऊर्जा से लबरेज होनें अवश्य पधारें।।

*पेन नेंग कार्य ,आंगा श्रृंगार कार्यक्रम*02. 04 .2026 दिन -गुरूवार*
(1) लिंगो पेन के सात श्रम सहकार सिरहा-गुनियाओं का उपास,सामुहिक पेन कार्य,
(2) पेन बानाओं का सिंगार एवं नये रूप में सृजन हेतु नेंग,लिंगो पेन का सेवा-अरजी-बिनती,
(3)परगना के प्रमुख नेंग कार्य के रूप में पावे कुंदा,परगन सगा,लिंगो के लामहाड़े-लामकोड़ियार(लमसेना-लमसेनीन) के साथ अन्य पेन बानाओं का आगमन,परघाव,पेन कड़ा,पेन राऊड़ का मुआयना,किलीकुटी,कर्रसाड़ निर्विघ्न संपन्न करनें हेतु जागा बुम,नेल बुम मालिक बुमयार्र,जिमीदारिन याया,पाट पुरका एवं बस्तर के 18पाट ,32बहना का निर्कुल बुम से बिनती व संयगल बुम दीप के पेन-पुरूड-लाव से अनुमति प्राप्त करना।

*पेन कर्रसाड़-पेन हाटुम दिनांक 03.04.2026 दिन -शुक्रवार*

(1)प्रसिद्ध लिंगो पेन बाना के आंगा का श्रृंगार रश्म
(2)अठ्ठारह गढ़िया पेन के व्दारा कर्रसाड़ स्थल का किली-कूटी नेग
(3) विश्व शांति वातावरण निर्माण हेतु, प्रकृति के संरक्षण संवर्धन हेतु,विश्व मानव समुदाय में सुख, शांति,समृद्धि के लिये 33 बानी बिरादरी,पेन्क बानाओं से सामुहिक सलाह-मशविरा,अरजी बिनती,
(3) लिंगो कर्रसाड़ में आमंत्रित नव आगंतुक पेन बानाएं,आँगा, डोली,लाट,गूटे, कोला,सच्चेर, बड़गा, हुकुम के साथ क्रमश:दक्षिण दिशा मार्ग से पधारें पल्लो बुमकाल पेनों का स्वागत
(4) तत्पश्चात उत्तर दिशा मार्ग में : उपस्थित पेन बानाओं का आसन ग्रहण -साथ मानव गोंदोला का परघाव,पेन जोहार,यथोचित डेरा-पेन आसन देना।
(5) कुपार लिंगो पेन बाना आँगा का पेनकसा में येर्र मियाना,निर्कुल के लिए पेन बानाओ का प्रस्थान
(6) विश्व प्रसिद्ध जातरा का प्रारम्भ,18 प्रकार के वाद्ययंत्रों के साथ ,पारंपरिक परिधानों में ढोल नृत्य,पेन पाटांग,
(7) सगा बुमकाल को सत वचेन,दिशा-दशा का बोध,पोतागड़ियाह द्वारा पेन बाना समस्त पेनो,पेरमा,पुजार्क,पंच, सिरहा-गुनिया,गायता ,बानी-बिरादरी पेन माजी,चालकी,हिकमी,मोकड़दम,पाटाड़ी,अक्को-मामल, सगा पारी एवं श्रम सहकार पेनों के साथ तीन चरण में पेन कर्रसाड़ कार्यक्रम
(8)सांयकाल पेन बानाओं में दीप प्रज्जवलन,प्रकृति सम्मत वांछित चीजो से सेवा- अरजी-बिनती
(10),रात्रिकालीन पेन कर्रसाड़ ,18 वाद्ययंत्रों के साथ पेन पाटांग,जातरा पाटांग, डोल नृत्य जारी कोयागड़ (गड़दा/पांजा/गुफा मानव का आश्रय प्रारम्भिक स्थल) दूसरे पहर गड़ सेवा-अरजी-बिनती।

*सेवा-अरजी-बिनती-वचन कार्यक्रम दिनांक 04.04.2026 दिन -शनिवार*
(1) प्रात:काल कुपार लिंगो पेन बानाओ सगा संबंधित बुमकाल व लाकंज कुंदा भाईयों द्वारा नवश्रृजित पेन आंगा,डांग,डोली लाट व नये सिरहाओं की जांच पड़ताल व पहचान,
(2)पेन बाना विवाद प्रकरणों का निपटारा,पेन बुमकाल से सूझाव,पेन संस्कृति के अनुरूप सेवा पद्धति,
(3) संयुक्त पेन बुमकाल दरबार पेन पुर्रूड़ की रक्षा,पर्यावरण संरक्षण,कोयापुनेम,शिक्षा,सगा स्नेह,बानी बिरादरी से समरसता,विचार,टोंडा-मंडा-कुंडा,गड़-मंडा-जागा,नार्र ,होरकुल,हुंजाड़ की समीक्षा,पहचान,पेन कड़ाओं की संरक्षण,अस्मिता की रक्षा एवं बुमकाल व्यवस्था का मौलिक संरक्षण हेतु सुझाव विचार
(4) पोलो दिया,बार दिया, को जानना आगामी लिंगो पेन कर्रसाड़ 2030 हेतु सुझाव,नव आगंतुक पेन बानाओं का निर्कुलीकरण,दूसरे पहर पेन सेवा सामाग्री वितरण,
(5)लिंगो पेनबाना आँगा का पेन राऊड़ में प्रवेश रश्म,सगा होड़याना,सगा जोहारनी हेतु अंतिम लिंगो भेट,नेंग।
(6)बाहर से आये हुये गड़-गोंदोला समुदाय एवं पेन बानाओं का बिदाई नेंग।

*लिंगो,लिंगो कर्रसाड़ ,सेमरगांव,बस्तर की लोक संस्कृति बानी बिरादरी व्यवस्था और कोयापुनेम सें जुड़े रोचक तथ्य*:-
बस्तर की लोक संस्कृति में लौकिक शक्तियों की पैठ बहुत गहरी है।यह हर गाँव के अपनें देवी-देवता है हर गाँव में देवगुड़ी है ।जहाँ किसी न किसी दैवीय शक्ति का निवास है माना जाता है,बस्तर अँचल के गाँवों में देवी-देवताओ को मानने की परपंरा अन्य क्षेत्रो से काफी भिन्न है।यह की विशेषता यहाँ की परम्परा को बुझने समझनें के लिए बाहरी दुनियाँ के लोगों को जिज्ञासु करती है ।बस्तर अँचल को अगर हम “देवी-देवताओ की भूमि” कहें तो शायद गलत नहीं होगा प्रत्येक देवी-देवता का अपना स्थानीय महत्व होता है।और इनमें सें कुछ तो अपनें आस पास के गाँवों में भी बेहद लोकप्रिय है।ऐसा ही देवो प्रमुख विश्व प्रसिद्ध देव पहांदी पारी कुपार लिंगो है।बस्तर की सामाजिक ताना-बाना साझी विरासत ,सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए जनजातियों, बस्तरवासिंयों और बानी बिरादरी समुदाय के धर्म के समन्वयात्मक स्वरूप को समझना अनिवार्य है।

*कौन है पहांदी पारी कुपार लिंगो*?
पहांदी पारी कुपार लिंगों गोड़ जनजाति और बानी बिरादरी समुदाय के प्रमुख देवता जनक और प्रथम गुरू माने जाते है।

विश्व में पायें जाने वाले समस्त आदिवासियों में एक अलग प्रकार की धार्मिक व्यवस्था पायी जाती है जो अन्य जातीय समुदाय के धार्मिक व्यवस्था से अलग पहचान बनाये हुए है।विश्व के प्रत्येक समुदाय में किसी-न-किसी महापुरुष ने जन्म लिया है तथा समस्त मानव कल्याण के लिए जीवन्त पर्यन्त काम किया ।उन महापुरूषों, साधू, संतो, ॠषियों जो समाज के पथ प्रदर्शक रहे तथा जिन्होने आदर्श मूल्यों पर आधारित जीवन जीने के लिए कार्य कियें।इसी प्रकार जनजाति समुदाय और बानी बिरादरी समुदाय में एक युग प्रवर्तक दार्शनिक पहांदी पारी कुपार लिंगो हुए जिन्होनें मानव समुदाय को एक नयी दिशा दी जो प्रकृति सम्मत थी ।पारी कुपार लिंगों मुदियाल दर्शन को आत्मसात करने के कारण ही जनजाति समाज सभी धर्मों का सम्मान करता है।कभी भी दूसरे धर्म पर हस्तक्षेप नहीं किया।जनजाति और बानी बिरादरी समुदाय बहुदैव वाद पर विश्वास करता है।लिंगो को समाज का पथ प्रदर्शक माना जाता है ।यह निर्विवाद सत्य है कि समाज की सामाजिक, आर्थिक,सांस्कृतिक, धार्मिक,आध्यात्मिक, न्यायिक तथा राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण पारी कुपार लिंगो मुंदिया का देन है।

लिंगो एक पदवी है जो वर्तमान तक 88 लिंगो के अस्तित्व को माना जाता है।हम अभी जिनके बारें चर्चा कर रहे वें लिंगो 84 वाँ लिंगो है ।

*पहांदी पारी कुपार लिंगो के कार्य*:-

(1) पुनेम गुरू नें प्राचीन काल में कोयामुरी व्दीप में चार संभागों में कोया वंश के लोगों को नदी नालों के किनारें छोटे-छोटे गण राज्य थे और अपने-अपने गण राज्यों के विस्तार के लिए आपस में संघर्ष करते थे।उन सभी को सगावेन युक्त(जिनसे वैवाहिक संबंध होता है) सामुदायिक व्यवस्था संचारित कर एक दूसरे के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने का नियम लिंगो ने स्थापित किया,जिससे आपसी संघर्ष समाप्त होकर उनके बीच नातेदारी का संबंध एवं भाई चारा स्थापित हुआ।

(2) लिंगो ने बानी-बिरादरी संस्कृति, सामाजिक ताना-बाना ,साझी-विरासत परंपरा, समाज और कोयापुनेम (एक श्रेष्ठ आदर्श मूल्य जीवन पध्दति) की स्थापना की।उन्होने कोयतुर समुदाय के साथ बानी बिरादरी (12 बानी,22बानी,33बानी) जीवों को गोत्र (टोटम)व्यवस्था,सगा रिश्तेदारी और गोटूल (शिक्षा केन्द्र)के माध्यम सें एक सूत्र में बाँधा और सामाजिक समरसता संयुक्त पेनकड़ा(कुटुम्ब व्यवस्था,स्वबोध-विकास,सदभाव, पर्यावरण के प्रति प्रेम,जिम्मेदार व्यक्तित्व का निर्माण) के साथ प्रकृति से जुड़े श्रेष्ठ आदर्श जीवन मूल्य और विविधतापूर्ण में मौलिक एकता, प्राकृतिक संतुलन व सामाजिक नियम सिखाएँ।

(3) लिंगो नें अपने बौध्दिक ज्ञान से प्रकृति के यर्थात रहस्यों को पहचाना। उसके क्रियाकलापों की सर्वोच्च शक्ति को फड़ापेन (फरसापेन,बूढ़ालपेन सजोरपेन)नाम से संबोधित किया।उनके अनुसार प्रकृति में सल्ला और गागरा यह दो ऊना-पूना (धन-ॠण)परस्पर विरोधी तत्व है।जिनकी आपसी क्रिया-प्रक्रिया का चक्र चलायमान है ।यह पहले भी थी,आज भी है और भविष्य में रहेगी। उसमें मात्र परिवर्तन होता रहता है। इस सत्यता को कोयावंशीय लोगों को समझाया गया।जो आज भी उसी शक्ति की उपासना करते है।

(4)प्राकृतिक कालचक्र में स्वयं को समायोजित कर अपना अस्तित्व बनाये रखनें हेतु सबल और बुध्दिमान नवसत्व कोयावंशीय समुदाय में होना चाहिए, यह जानकार उसनें अपने बौध्दिक ज्ञान के बल से सम-विषम गुण एवं संस्कारों के अनुसार सगावेन घटकयुक्त सामुदायिक व्यवस्था स्थापित किया और सम-विषम गोत्र, गोत्र चिन्ह और सगावेन घटकों में वैवाहिक संबंध स्थापित करने का मार्ग बताया। क्योंकि दो परस्पर विरोधी गुण संस्कारों के क्रिया-प्रक्रिया से ही सबल और बुद्धिमान नवसत्व निर्माण हो सकते है।प्रकृति के इस रहस्य को उसनें सर्वत्र प्रचारित किया।यह सामाजिक व्यवस्था विश्व की सर्वश्रेष्ठ और उच्च कोटि के मूल्य से परिपूर्ण व्यवस्था है।

(5)लिंगो दर्शन का अंतिम लक्ष्य जनकल्याण है।उन्होनें जनकल्याण पंचखंड धरती के शासक शंभूशेक के माध्यम से सेवा का मार्ग बताया। इसका अर्थ दूसरों की सेवा करके ही सगा जनों और प्रकृति के अन्य सभी जीव-जन्तुओं का कल्याण किया जा सकता है।

(6)मनुष्य इस प्रकृति का अंश है।अतः प्रकृति के अन्य सत्वों की सेवा उसे सदा प्राप्त होती है ।इसलिए प्राकृतिक संतुलन बनाये रखना अनिवार्य है ।जनजाति गोत्र समुदाय को समुदाय को उसनें कुल 750 कुल गोत्रों में विभाजित किया और प्रत्येक कुल गोत्र के लिए एक पशु,पक्षी तथा एक वनस्पति को कुल चिन्ह के रूप में आबंटित किया।प्रत्येक कुल गोत्र धारक अपनें कुल चिन्ह सें सम्बंधित प्रकृति के सत्वों की सुरक्षा करते है और अपने कुल चिन्हों के सत्वों को छोड़कर अन्य जीव सत्वों का मात्र आवश्यकतानुसार भक्षण भी करते है। इस तरह जनजाति और बानी बिरादरी समुदाय एक साथ 2250 प्राकृतिक जीव सत्वों की एक ओर सुरक्षा भी करते है ,तो दूसरी ओर आवश्यकतानुसार भक्षण भी,जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है।इस तरह सभी जीवों को प्रकृति की सेवा निरन्तर प्राप्त होती रहे,जिससे प्रकृति का संतुलन बनायें रखनें हेतु मार्ग बताया ,जो आज भी कायम है।

(7)पहांदी पारी कुपार लिंगो नें बानी -बिरादरी और सगावेन समुदाय के लोंगों को पाँच पूजनीय सत्व प्रदान किये है:-(1) सगा (2)गोटूल(3)पेनकड़ा(4)पुनेम (5)मुठवा (गुरू)। इन पाँच सत्वों का पुनेंम का मूलाधार कहा जाता हैं। सगा यानि सगावेनयुक्त सामुदायिक व्यवस्था, गोटूल अर्थात शिक्षा एवं संस्कारों का केन्द्र पेनकड़ा यानि सर्वोच्च शक्ति का उपासना स्थल। पुनेम का अर्थ-जीवन का सदमार्ग और मुठवा का अर्थ इस पुनेम के जानकार व्यक्ति। इन पाँच सत्वों के अनुसार चल कर जन कल्याण किया जा सकता है।

(8)लिंगो ने प्राकृतिक न्याय एवं अंहिसा के सिध्दांत का प्रतिपादन किया तथा सत्य नीति आचार -विचार, ईमानदारी, सेवा भाव तथा सत्य वाणी की शिक्षा इस समुदाय को दी,जो आज भी हर कदम दृष्टि गोचर होता है।

(9)शंभूशेक के डमरू (गोएन्दाड़ी)की आवाज से पारी कुपार लिंगो ने गोएदांड़ी (गोंडी)आवाज की रचना की और उसी वाणी से कोया पुनेम का प्रचार प्रसार किया।पहांदी पारी कुपार लिंगो नें हर ग्राम में गोटूल (सामाजिक सरोकारिता को पूरी करने की संस्था) नामक संस्कार एवं शिक्षा केन्द्र की स्थापना की ।जिसमें 12 वर्षों से अधिक उम्र के बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान करने का कार्य लिंगों ने शुरू किया।

(10) लिंगो नें सामाजिक संस्कार संगठन की भावना को बल दिया दिया।गाँव के सामाजिक कार्य (विवाह, मृत्यु,निर्माण, कार्य आदि) में श्रमदान के लिए प्रेरित किया। गीत,संगीत, नृत्य, कला आदि की शिक्षा दी।गांव में आयी किसी विपत्ति का सामना एकजुट होकर होकर किया जाता है ,जिससे कर्तव्य बोध तथा सामूहिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा दिया,सामूहिक एकता, सहकारिता के भाव से संस्कारित किया।वाचिक परम्परा को नृत्य, गीत, संगीत,कला ,गाथा,पेनकड़ा व्यवस्था, गोटूल और रेला के माध्यम से नित्य प्रसार किया और अनुशासित जीवन जीने की सीख दी।

(11) लिंगो नें अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों, टोटेमिक जीवांग व्यवस्था,गोत्र सिस्टम को मानव प्रजातियों में व्यवस्थित करने,18 वाद्ययंत्रों की खोज, पुकराल (ब्रहमाण्ड ) और बिग बैंग के बाद की पुकराल की स्थिति से सम्बंधित सिध्दांत, डाका अन पाटा गुरू, रेला,गीत,संगीत, नृत्य, कला वाचिक साहित्य के रचियता है जो सगा समुदाय को सिखाया।

(12) पुकराल(ब्रहमाण्ड)के सूक्ष्मतम कणों के लिए 12 वें कण की खोज ,मानव प्रजाति को इस पृथ्वी पर अनंतकाल तक जीवित रखनें का पुरूड़ (प्रकृति) अनुकूलित कोयापुनेमी रूपी व्यवहारिक जीवन मार्ग के प्रेणता है।
(13) विश्व के प्रथम सिस्टेमेटिक ऐजुकेशन केन्द्र गोटूल के संस्थापक आदि-आदि अनेक ऐसी उनकी खोजे है जिसके करीब जैसें-जैसें आधुनिक विज्ञान पहुँच रहा हैं वैसे-वैसें हतप्रद सा महसूस करने लगा है।
(14) लिंगों पेन के ऐतिहासिक गाथाओं को हम मेहुला-मुरियान-हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता के विकसित हाटुम इकोनॉमी सिस्टम, गोंडरी इकोनॉमी सिस्टम को सगा समुदाय को सिखाया।

(15) लिंगो पेन नें गण्ड, गोंड, गोंण्डवाना, गण, गोंण्डी ,गोटूल,गुड़ी, गायता व्यवस्था,दूध,खूट, पाट,-टण्डा-मण्डा-कुण्डा,गढ़-जागा-मंडा व्यवस्था और बानी-बिरादरी व्यवस्थित सामाजिक, प्रशासनिक ,शैक्षणिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक सम्मत अदभूत सरंचनाओं को सगा समुदाय के झिर्र (डीएनए)मे महसूस कराया और सिखाया।

*लिंगो, लिंगो कर्रसाड़ और उनके महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं*:-

विश्व प्रसिद्ध पहांदी पारी कुपारी लिंगो पेन कर्रसाड़ पुनेम और बानी बिरादरी, पेनकड़ा, पाँच सत्वों के माध्यम सें सगा समुदाय को सर्वांगीण विकास के साथ अपनें पारम्परिक,धर्म,संस्कृति, संस्कार और रीति-रिवाज को बनाए रखनें की प्ररेणा देता है।सहस्त्राब्दियों वर्ष पूर्व से सतत् प्रति चार वर्षो के अंतराल मे होने वाली व दुनिया की सबसें प्राचीनतम प्रयोजन पहांदी पारी कुपार लिंगो कर्रसाड़ है।माँझी, मुखियाँ, गायता पेनो पुजार्क बताते है कि 50 वर्ष पूर्व यह जातरा 12 साल में एक बार होता था।इसके पीछे मान्यता यह थी कि 12 साल बाद बाँस के फूल खिलते थे।जो बारिश नहीं होनें कि प्रतीक था।लोग बरसात के लिए कर्रसाड़ निकालते थे। पेनों पुजार्क यह भी मानते है कि तिथि का निर्धारण लिंगो आँगा पेन और स्थानीय देवता की अनुमति से चन्द्रमा को देखकर किया जाता है।इसलिए इसकी तैयारी एक साल पहलें ही शुरू हो जाती है।

*सेमरगांव और सेमल सें जुड़े लिंगो व्दारा अनुसंधान व वैज्ञानिक तथ्य*:-
जिस जगह लिंगो पेन का स्थल है उस गाँव का नाम है सेमरगांव जिसें गोंडी में वलेकनार कहते है।वलेक मड़ा मतलब सेमल का वृक्ष। सेमल वृक्ष के नाम से सेमरगांव पड़ा, बुजुर्ग बतातें है इसी वृक्ष के नीचें लिंगो ने तप- तपस्या,साधना कर इस वृक्ष को देखकर,सिखकर,जी कर सगा समुदाय और पुनेम व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त किया।लिगोंपेन नें यूनिवर्स के रहस्यों को उजागर करने के दिशा में किसी तत्व के 12 वें कण गाॅड पार्टिकल्स, हिंग्स बोसान कण,जिर्र(डीएनए)के संसुचन सें संबंधित वलेक मड़ा का मानव विकास व प्रकृति में अति महत्वपूर्ण योगदान है।इसलिए इस वृक्ष को “ज्ञान वृक्ष” का दर्जा दिया गया है।इसी वृक्ष पर महान वैज्ञानिक पहांदी पारी कुपार लिंगों पेन गहन कर पहली बार यूनिवर्स के अनेक रहस्यों विनियमों को समझनें में सफलता पायी थी।

इसी सेमल/वलेक वृक्ष पर अध्ययन के दौरान उन्होनें बताया कि पृथ्वी पर अंनतकाल तक जीवन की संभावनाओं को बनाएं रखने के लिए परस्पर सहजीविता का होना आवश्यक है और उन्होनें जाना कि प्रकृति में सबसें लोकप्रिय प्रजाति ही इस पृथ्वी पर लम्बें समय तक टीक पाती है।

लिंगों पेन नें सेमल वृक्ष की शाखाओं व उन पर पत्तियों की स्थिति के आधार पर डार्विन से हजारों वर्ष पूर्व 750×3=2250 अलग-अलग प्रजाति के वनस्पतियों ,जीव,जन्तओं का प्रतिचयन कर 1 से लेकर 7 के क्रम में व्यवस्थित किया फिर 7 सें लेकर 12 व्यवस्थापन कर 1 से 7 समूह वालें ग्रूप में प्रत्येक पर 300 (100×3) वनस्पतियों-जीव-जन्तुओं को रखकर फिर अगलें 8 से 12 तक वालें समूहों पर पर 30 (10×30) वनस्पतियों को व्यवस्थित किया।

सेमल वृक्ष के शाखा फुल-फल-पत्ती और बीच के संरचनाओं सें लिंगों पेन कों प्रकृति का व्यवहार यूनिवर्स के फैलाव अर्थात पुकराल (ब्रहमाण्ड)के तारों व ग्रहों और आकाशगंगा की स्थिति, ब्लैक होल,बिग बैंग की घटना आदि के भी अध्ययन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

वलेक मड़ा दुनिया की उन अदभूत प्रजातियों में से एक है जो अपने बीज का प्रसारण ,सबसे अधिक दूरी तक, वायु में उड़कर ,पानी के ऊपर बहकर जमीन से लड़कर प्रसार करता है।जनजाति और बानी-बिरादरी समुदाय उन दूसरें प्रजातियों को जो पृथ्वी के इको सिस्टम (पारिस्थितिकीय तंत्र)को बनाए रखनें में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।उन्हें वे अपने “पेन टोटेमिक सिस्टम” में जगह देकर सम्मानित करते हुए उसकें संरक्षण की जिम्मेदारी भी लेते है।जिसें उनकी आनें वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ो में जोड़े रखने रूढ़ी प्रथा के साथ अनंतकाल पीढ़ी दर पीढ़ी तक निभाते हैं।

वलेक मड़ा ऐसा अदभूत वृक्ष है जो रहवास में सूर्य की ऊर्जामयी किरणों को सबसे पहले आकर्षित करता है जिससे अलसुबह सूर्य की किरणें की चाहत में अनेक जीव-जन्तुओ का जमावाड़ा इस पर बना रहता है साथ ही कांटो भरी तनों के साथ भी भालुओ जैसे हनिहंटर जीवों के लिए विपरीत डिजाइन शाखाओं की बनावट सें इस पर बनीं मधुमक्खियों की छत्तों की काॅलोनियो इस वृक्ष को पर्यावरण संतुलन की अव्दितीय इकाई में तब्दील कर देती है।इसलिए गोटूल एजुकेशन सिस्टम के युवक-युवतिंयों के लिए यह प्रैक्टिकल लैब व मौसम वैधशाला की ही तरह थी।इस ज्ञान वृक्ष की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए आज भी गोटूल लयोर इसें अपने गोटूल स्थापना के समय से हीं इसें अपनें गोटूल केन्द्रों में लगाते है।इस वृक्ष के पुष्पन से ठीक पहले पुस माह में होनें वालें महान पुस कोलांग,पेन कोलांग नृत्य अभियान के दौरान इसी वृक्ष पर सबसें महत्वपूर्ण अनुष्ठान भी सम्पादित किया जाता है।

वलेक मड़ा के छोटी काँटेदार शाखाओ का उपयोग गोटूल स्टूडेंट्स अनुशासन बनाएँ रखने में भी करते है।इसी वृक्ष के रेखाचित्र हमें हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की महान सभ्यता में मिली है।इसके फलों से ही तैयार रेशे व गतली इस पृथ्वी पर सबसें पहली बार मानव को देखनें को मिला जिसें हम आज कपड़े नाम से जानते है।मेहुला-हड़प्पा-मोहनजोदड़ो के सबसें महत्वपूर्ण तीन सिंग धारी देवता जिसें हम पहांदी पारी कुपार लिंगों के रूप में जानतें उन्होनें इसी वृक्ष को अपना पेन वृक्ष स्वीकार किया और भी आश्चर्यजनक पहलू है कि लिगोंपेन का पेन राऊड़ (शक्ति स्थल)जिस गाँव में स्थित है उसका नाम भी वलेकनार है (वलेक=सेमल+नार=गाँव=सेमरगांव)इस वृक्ष से जुड़ी ऐसी असंख्य कड़िया है जो हमें अपनें जड़ो से जोड़कर गर्व महसूस कराती है।

ज्ञान वृक्ष नाम से प्रसिद्ध पवित्र स्थल सेमरगांव में लिंगो को पुनेम परपंरा में प्रथम वैज्ञानिक और दर्शनशास्त्री माना जाता है।उन्हे संगीत के जनक के रूप मे याद किया जाता है।पारी कुपार लिंगो के इस जातरा में 33 बानी-बिरादरी गोत्र के प्रमुख देव,आँगा पेन, पेन नेवता के अनुसार आमंत्रित किया जाता है।

इस तीन दिवसीय विश्व प्रसिद्ध लिगों कर्रसाड़ में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलांगना,झारखंड ,गुजरात, कर्नाटक, केरल,तमिलनाडू,राजस्थान आदि राज्यों के जनजाति समाज और बानी-बिरादरी समुदाय के लोग सम्मिलित होते है साथ ही देशभर एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक श्रध्दालु आते है।जिसमें बड़ी संख्या में युवक-युवती महिला-पुरुष होते है प्रकृति को समर्पित इस जातरा में 18 वाद्ययंत्रों के ताल में “ऐन्दाना डाका” पैर से पैर मिलाकर किए जाने वाले नृत्य और गुरू लिगोंपेन का अदभूत कर्रसाड़ आकर्षण का केन्द्र होता है।जातरा के मौके पर जब लिंगो को उनके स्थान से उठाया जाता है कच्चे बाँसो के झुंड को सैकड़ो युवकों व्दारा आपस में टकराया जाता है जिससें एक खास प्रकार की ध्वनि निकलती हैं। इसें झांटी कहते है।

मान्यता है कि लिंगोपेन को उठाने लिए 5 लोंगो का चयन लिगोंपेन स्वयं करते है। इसकें लिए वे इनके शरीर में आते है।ऐसें लोगों पर में सें एक व्यक्ति तीर-कमान दूसरा तलवार तीसरा गुड्डे(मोर पंख से बना हुआ एक प्रतीक))चौथा छत्तर लेकर सामने-सामने चलते है साथ ही इस जातरा में सम्मिलित देशभर के संयुक्त मड़ा पेन जगह से आये देवी-देवताओ को नृत्य के लिए उठातें है तो यह दृश्य बड़ा मनमोहक होता है वाद्ययंत्रों की सुरीली धुन से जंगल खिल उठता है। हजारों पेन पाट आँगा शक्तियों के पेन करसना सें उत्पन्न पुनेमी ऊर्जा से सराबोर होने के लिए इस सहस्त्राब्दियों से पीढी दर पीढ़ी प्रति चार साल में आयोजित होने वालें इस महान पेन कर्रसाड़ में जरूर सम्मिलित होइए..

इस पेन कर्रसाड़ का संचालन हमारे महान पेनों पुजार्क माँझी गायताओ के व्दारा सहस्त्राब्दियों से चली आर रही पारंपरिक परम्पराओ के साथ कई जाती है कि वे पेन कर्रसाड़ के पारंपरिक व्यवस्था के आधार पर ही सेवा दर्शन करे।

पुनेमी संचरण में लगें तमाम संगठनों से अपील भी है कि वे इन तिथियों पर कोई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित न करें। इस अदभूत लिंगोपेन कर्रसाड़ में आप सभी अपनी डीएनए में अपनें पूर्वजों के पुरूड़ ऊर्जा को महसूस करने जरूर आए और अपने आने वाली पीढ़ियों को पीढ़ी दर पीढ़ी पुनेम जड़ो में जोड़े रखे।

*लिंगो कर्रसाड़ सम्मिलित होने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश*…….
(1)लिंगो पेन का करसाड़ पुर्वजों से चली आ रही प्रचलित परंपरानुसार ही किया जायेगा।
(2)बुमकाल द्वारा लिंगो पेन करसाड़ हेतु तय माप दंडो को पालन करना अनिवार्य होगा,अन्यथा पेन दंड के भागीदारी होंगे।
(3) कर्रसाड़ में आनें वाले प्रत्येक महिला-पुरूषों को पारंपरिक पोषाक में आना अनिवार्य होगा यानि महिलाओं को साड़ी-ब्लाऊज तथा पुरूषों को धोती-लूंगी अनिवार्य होगा(,07लाकंजभाई एवं 07अक्को मामाल को लंगोट(तोकेर) पहनना अनिवार्य होगा ,इनकी महिलाये सफेद साड़ी ब्लाऊज में रहेंगी)।
(4) कर्रसाड़ स्थल में मोबाईल फोन,कैमरा से वीडियो रिकार्डिंग-फोटो ग्राफी,जुता-चप्पल पूर्णत:वर्जित रहेगा।
(5)कर्रसाड़ स्थल के पास किसी भी तरह का नशा खरीदी -बिक्री प्रतिबंधित रहेगा,यदि ऐसा करते पाया गया तो बुमकाल द्वारा तय दंड के भागीदारी होंगे।
(6)दर्शनार्थियों द्वारा किसी भी पेन बानाओं को छूना सक्त मना है,उल्लंघन करनें पर दंड के भागीदारी होंगे।
(7)व्ही आई पी व्यवस्था नहीं होगी यानि कि सांसद विधायक मंत्री गणों,अधिकारियों को भी सामान्य व्यक्तियों के समान ही करसाड़ में भाग लेना होगा।
(8)दर्शन करनें आनें वाले नारियल,धुप,लाली और डोंगे ही चढ़ायें,अगरबत्ती न लायें।अगरबत्ती पूर्णत:प्रतिबंधित रहेगा।
(8)विभिन्न जनप्रतिनिधियों द्वारा स्टाल लगाकर भोजन-पेज(जावा-गाटो) को भी प्रतिबंधित किया गया है,क्योंकि यह हमारे पुरखों की परंपरा नहीं है।
(10)ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग भी अतिआवश्यक होनें पर ही किया जायेगा।
(11)नशापान कर हुल्लड़ करनें वालों तथा अनावश्यक विवाद करनें वालों को परगन बुमकाल का फैसला मानना अनिवार्य होगा।
(12)प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रानिक मीडिया,यू-टयुबरों को मीडिया कक्ष में विषय वस्तु के जानकार बुमकाल द्वारा अधिकृत लोगों द्वारा बाईट दिया जायेगा।वही मान्य होगा।।
वल्लेकनार्र(सेमरगांव)पहुंच मार्ग……..

(1)..राष्टीय राजमार्ग30 में स्थित बेड़मा से पश्चिम दिशा में आमाबेड़ा-सेमरगांव दूरी 50 किमी सड़क मार्ग से।
(इस मार्ग में मड़व (मंडावी)लोगों का पेनकड़ा धनोरा स्थित है जहां खंडा मुदिया पेन का प्रसिद्ध राऊड़ है।उसके आगे बेलगांव में खंडा मुदिया का बेटा नागसुरजा का राऊड़ है।आगे इरागांव से कलेपाड़ में कोर्राम कुंदा का पाटपेन देवान मुदिया का राऊड़ है।धनोरा से आगे उमला गांव है जहां मुठ मुदिया तादो का पेन राऊड़ है।

(2)..अंतागढ़ से सेमरगांव दूरी20किमी सड़क मार्ग से…
यह मार्ग चर्रे-मर्रे जलप्रपात एवं मनोरम ,रोमांचक प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण है।

(3)..कांकेर से कोरर होकर सेमरगांव पहुंच मार्ग..दूरी50 किमी… मनोरम तरांदूल घाटी इसी मार्ग पर है।लिंगो पेन का बेटा मड़नमर्र और उसका नाती बालकुंवर का राऊड़ भी मिलेगा।

(4)…जिला मुख्यालय कांकेर से सड़क मार्ग द्वारा पीढ़ापाल-तरांदूल होकर सेमरगांव पहुंचा जा सकता है,दूरी-लगभग35 किमी।

(5) जिला मुख्यालय कांकेर से मरदापुट्टी मलांजकुडुम जलप्रपात मनोरम रोमांचक प्राकृतिक घाटी होते हुए सेमरगांव पहुँचा जा सकता है।
टीप:- समस्त दर्शनार्थी परगन बुमकाल द्वारा निर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन करते हुये ब्यवस्था बनानें में सहयोग करेंगें या बुमकाल द्वारा तय डांड़ और दंड के लिये तैयार रहेंगे।।

*विकेश हिचामी*

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