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भ्रष्टाचार और प्रशासनिक नाकामी से खतरे में तांदुला जलाशय।

लीलाधर साहू

गुण्डरदेही।

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में तांदुला जलाशय, जो कभी इस क्षेत्र की समृद्धि और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक था, आज गंभीर खतरे का सामना कर रहा है। अवैध निर्माण, प्रदूषण और भ्रष्टाचार ने इसके जल की शुद्धता और उपयोगिता को संकट में डाल दिया है। यह जलाशय न केवल पेयजल का मुख्य स्रोत है, बल्कि हजारों किसानों की खेती का आधार भी है। रिसॉर्ट से निकलने वाला गंदा पानी सीधे जलाशय में मिल रहा है और वेटलैंड में अनधिकृत निर्माण ने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाया है।

तांदुला जलाशय मूल रूप से सिंचाई और सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाया गया था। इसका वेटलैंड क्षेत्र पक्षियों, मछलियों और जलीय प्रजातियों का प्राकृतिक निवास है, जो पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है। यह जलाशय दशकों तक बालोद की हरियाली का आधार रहा, लेकिन अब रिसॉर्ट का दूषित पानी पेयजल और सिंचाई के पानी को जहरीला बना रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमों को ताक पर रखकर वेटलैंड में अवैध निर्माण हुआ। निर्माण से पहले मुरुम की खुदाई ने प्राकृतिक संरचना को नष्ट किया। अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और रिसॉर्ट संचालकों पर साठगांठ और उगाही के आरोप हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और पर्यावरण नियमों की अनदेखी प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार को उजागर करती है।किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उनका कहना है कि दूषित पानी खेतों तक पहुँचकर फसल उत्पादन घटा रहा है। भविष्य में पानी की कमी का खतरा मंडरा रहा है।

किसानों की आजीविका को व्यावसायिक हितों के लिए खतरे में डाला जा रहा है। ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज दबाई जा रही है। यह सामाजिक अन्याय का जीता-जागता उदाहरण है।पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो जलाशय की जैव-विविधता नष्ट हो सकती है। दूषित पानी से मानव स्वास्थ्य, फसल उत्पादन और क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा व अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।किसान और स्थानीय लोग मांग करते हैं कि वेटलैंड के अवैध निर्माण तुरंत हटाए जाएँ और जिम्मेदार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों व रिसॉर्ट संचालकों पर सख्त कार्रवाई हो।

रिसॉर्ट से गंदे पानी को रोकने के लिए कड़े नियम लागू हों और जलाशय की नियमित निगरानी हो। संरक्षण में किसानों और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो और प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।तांदुला जलाशय सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि बालोद की पहचान और सांस्कृतिक धरोहर है। इसे बचाना पर्यावरणीय और सामाजिक जिम्मेदारी है। यदि प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई नहीं की, तो इसका असर भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ेगा। सर्व समाज, किसान संगठन और स्थानीय लोग सरकार से तुरंत कार्रवाई की मांग करते हैं ताकि तांदुला जलाशय की शुद्धता और अस्तित्व बरकरार रहे।

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