Skip to main content

PATRIKA24x7

जनहित में समर्पित जनसेवक उमेश सेन ने एक बार फिर उठाई आवाज।

परस साहू बालोद

दिया तले अंधेरा: नगर पालिका के अंदर का हाल देखकर बाहर की व्यवस्था पर उठे सवाल

बालोद। शहर की साफ-सफाई और स्वच्छता व्यवस्था की जिम्मेदारी जिस नगर पालिका के कंधों पर है, अगर उसी व्यवस्था से जुड़े सार्वजनिक प्रसाधन कक्षों की हालत इतनी बदहाल नजर आए, तो सहज ही सवाल उठता है—जब नगर पालिका के अंदर ही ‘दिया तले अंधेरा’ है, तो शहर के बाकी हिस्सों में स्वच्छता व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या होगी?

सार्वजनिक प्रसाधनों की सामने आई तस्वीरें व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जर्जर दरवाजे, जंग लगी चौखटें, गंदा फर्श, जमा काई-मैल, दीवारों और टाइल्स पर गंदगी के निशान तथा खराब नल-फ्लश जैसी स्थिति यह संकेत देती है कि नियमित साफ-सफाई और रखरखाव पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

स्वच्छता के दावों के बीच जमीनी तस्वीर चिंताजनक

एक ओर स्वच्छ शहर और बेहतर नागरिक सुविधाओं को लेकर योजनाएं, अभियान और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक प्रसाधनों की बदहाल स्थिति उन दावों की जमीनी समीक्षा करने को मजबूर करती है।

इन प्रसाधनों का उपयोग प्रतिदिन आम नागरिकों, राहगीरों, छोटे व्यापारियों और अन्य जरूरतमंद लोगों द्वारा किया जाता है। ऐसे स्थानों पर साफ-सफाई की कमी केवल असुविधा का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सम्मान से भी जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।

नई योजनाओं के साथ पुरानी सुविधाओं की सुध भी जरूरी

शहर में नई सुविधाओं और आधुनिक प्रसाधन निर्माण की योजनाएं अपनी जगह आवश्यक हैं, लेकिन पहले से मौजूद सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षण और नियमित रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। करोड़ों की नई योजनाओं की चर्चा से पहले यह देखना जरूरी है कि वर्तमान में उपलब्ध सुविधाओं की स्थिति कैसी है और उनका उपयोग आम जनता के लिए वास्तव में कितना सुविधाजनक है।

उमेश सेन ने उठाए जवाबदेही से जुड़े सवाल

जनहित में समर्पित जनसेवक उमेश सेन ने इस मुद्दे को उठाते हुए नगर पालिका प्रशासन से मांग की है कि सार्वजनिक प्रसाधनों की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कराया जाए और जहां आवश्यक हो, तत्काल सफाई, मरम्मत तथा नियमित रखरखाव की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित प्रसाधनों की नियमित सफाई की जिम्मेदारी किसकी है, निरीक्षण कितनी नियमितता से किया जाता है और रखरखाव के लिए निर्धारित व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर होती है।

सबसे बड़ा सवाल—अंदर ऐसा हाल है तो बाहर क्या स्थिति होगी?

यह मामला केवल एक प्रसाधन कक्ष की गंदगी तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। यह नगर की समग्र स्वच्छता व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़ा करता है।

अगर नगर पालिका से जुड़े परिसर और सार्वजनिक सुविधाओं का यह हाल है, तो शहर के गली-मोहल्लों और सार्वजनिक स्थलों की व्यवस्था कितनी प्रभावी है—यह जांच और जवाबदेही का विषय है।

जनता को केवल स्वच्छता के दावे नहीं, बल्कि स्वच्छता का वास्तविक असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी तस्वीरों और शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए मौके का निरीक्षण करें और आवश्यक कार्रवाई करें।

— उमेश सेन
जनहित में समर्पित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!